Thursday, November 6, 2014

दुल्हन

सेज़ पर बैठी है वो
हर सुंदरता को खुद में समेटे,
लज्जा के परिधान में  लिपटी
जिसकी झुकी नज़रें बेचैन हैं।
जिसके होठों पर ख़ामोशी है
हलकी सी मुस्कराहट को वो भला,
कहाँ छुपा पाती है।
अपनी मेहंदी की खुशबू में
वो खुद ही खो जाना चाहती है ,
अपनी चूड़ियों की खनकाकर
वो कुछ कहना चाहती है।
उसे इंतज़ार है 'उसका'
जो उसका हाथ थामेगा,
जो इस रिश्ते को निभाने के लिए
सिर्फ प्यार और विश्वास मांगेगा।
यही सोच वो इतराती है
हाथों में चेहरे को छिपा शर्माती है,
जब शेहनाई की गूँज अचानक
उसका ध्यान तोड़ती है।
और वो हया के सागर में लिपटी हुयी
अपना आँचल ओढ़ती है,
उसकी आँखों का गहरा काजल
खुद अँधेरे को  चमकाता है।
हवा का झोंखा आज खुद
उसके गालों को सहलाता है,
सहेलियों के बीच बैठी वो
कुछ गुमसुम सी नज़र आती है।
आने वाले प्रेम के सागर में
बिन डूबे ही गोते खाती है,
आईने में अपना चेहरा देख
वो खुद पर ग़ुरूर करती है।
जिसका है आज उसे इंतज़ार
उसके सामने जाने से डरती है,
आज उसका आँगन होगा पराया
यह सोच, जब उसे जगाती है।
तो ख़ुशी में बसे ग़म से वो
अपनी आँखों से नीर बहाती है ,
बचपन की यादों  से सजा आँगन
आज पीछे ही छूट जाएगा।
हर पुराना रिश्ता आज
खुशियों के  साये में टूट जाएगा,
आज उसे इक परायी दुनिया में जाना है
अपने प्यार की खुशबू से नये आँगन को महकाना है।
अपनों से हँसते-मुस्कुराते बिछड़ना
ये कैसी घड़ी आई है ,
किसी 'अजनबी' के साथ  आगे बढ़ जाना
यही तो इक 'दुल्हन' की विदाई है।

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